Tuesday, October 27, 2009

मेज पर मरे हुए बच्चों की मुस्कान और जय जिहाद

मेज पर मरे हुए बच्चों की मुस्कान...
यूनिवर्सिटी की उस पहाड़ी पर शाम के धुंधलके में सिगरेट का धुंआ कसैलापन पैदा नहीं कर रहा था। बीयर के कैन की टिन कभी उठते-खिसकते स्किन से छू जाती, तो बदन चिहुंक जाता, मगर जाने का मन नहीं करता। छह दिन कुढ़ने, जलने और कटने के बाद ये संडे आया था और इसे यूं ही नहीं बीतने देना था। शाम हल्की और फिर तेजी से सांवली हो रही थी और चट्टान पर परसते न पसरते याद आ रहा था कि कुछ ही देर में सामने का जंगल भी ठंड से बचने के लिए धुंध की चादर ओढ़ लेगा।
उसकी आंखों में शाम बीतने के साथ लाली उतर रही थी, गोया डूबते सूरज से उधार लेकर आई हो। नहीं, हिंदुस्तान की फौज हमें तबाह कर रही है, आप लोगों तक तो खबरें भी नहीं आ पाती हैं। सचाई जाननी है तो यहां दिल्ली में बैठकर मैगजीन पढ़ना बंद करो। एक बार घाटी में जाओ, धुंध की चादर-वादर सब भूल जाओगे। चार बोतल का नशा चार सेकंड में उतर जाएगा मियां। जब कनपटी के बगल से गोली निकलती है न, तो दिमाग यह पूछने के काबिल नहीं रह जाता कि ये पीतल दहशतगर्द उड़ेल रहे हैं या फौजी।
मुझे लगा जावेद की बात में दम है। इसलिए नहीं क्योंकि हाल ही में शोपियां और उसके बाद एक और स्टूडेंट के केस में पुलिस, फौज की ज्यादती सामने आई है, इसलिए भी क्योंकि वो खुद उसी कश्मीर का रहने वाला है, इसीलिए उसकी बात चाहे सही लगे या गलत, सुनी जानी जरूरी है। जावेद चालू था कि आज भी उसका पासपोर्ट कुछ ज्यादा देर तक चेक किया जाता है और जैसे ही वो बोलता है कि मैं कश्मीरी मुसलमान हूं, हवा कुछ ठहरकर बहने लगती है।
सिगरेट बुझ चली थी, मगर बात इतनी गर्म हो चुकी थी कि दूसरी जलाने का जी नहीं किया किसी का। यार बाकी सब तो ठीक है जावेद, मगर आजादी की लड़ाई में जब मजहब की बात लाई जाती है, तो दिक्कत पैदा होती है। मान लिया कि कश्मीरी हिंदुस्तान और पाकिस्तान किसी के साथ नहीं रहना चाहते, मगर इसे इस्लाम की लडा़ई, जिहाद कैसे कहा जा सकता है।
बंद करो ये सब राजनैतिक बातें यार, हफ्ते के छह दिन तो यही सब चलता है। साइंस रिपोर्टर ने फरमान सुनाया। सबको लगा कि बात वाजिब भी है और जायज भी। एक बार फिर बीयर के सुर्ख सुरूर में ठंड से गुफ्तगू शुरू हो गई। यार चखना बढ़ाना जरा, सलीम बोला। सलीम का किरदार भी दिलचस्पी की हदें छूता है। मल्लू है, ऐसा वो खुद बोलता है, मगर हिंदी में बात करना पसंद करता है। उसके घर में कुरान-शरीफ के बगल में शिवलिंग रखा है। म्यूजिक बनाता है क्योंकि उसे लगता है कि यही सबसे बेहतर तरीका है दुनिया को बेहतर बनाने का। सचिन के लिए किसी से भी भिड़ जाएगा, मगर क्रिकेट मैच कभी लाइव नहीं देखेगा। पूछो तो वही जवाब, यार ये धुकधुकी जो है न, ये मुझसे बर्दाश्त नहीं होती सचिन को देखते वक्त।
हां तो हम बात कर रहे थे सलीम की, ओए नमकीन बढ़ा जरा, नमकीन वाला अखबार बढ़ा दिया गया, मैं चीखने को हुआ, ये क्या बे, आज के ही अखबार पर फैला दी, सब तेल हो गया, मेरी पेज वन बाईलाइन छपी थी। कम्बख्तों तुम्हें नरक भी नसीब नहीं होगा। ठहाके तेज हो गए। लाइटर जलाकर उस खबर को देखा जाने लगा। भाई लोगों में से एक ने बुलंद आवाज में आसपास के जंगल, झाड़ी औऱ पहाड़ों को सुनाते हुए खबर पढ़ना शुरू किया। बीच में ब्रेक भी लिए क्योंकि बकौल उनके यार हिंदी पढ़ने में लग जाती है, आदत ही नहीं रही, बोलते वक्त तो एकदम सूंसूं रफ्तार, मगर पढ़ने में बाप रे। खबर एक पाकिस्तानी शख्स राणा शौकत अली के बारे में थे। अब उन लोगों ने कैसे पढ़ी सुनी सो छोड़ो और हमारी जबानी ही मसले की झलक पा लो। वैसे ये खबर के पीछे की खबर है और इसमें रंग कुछ गाढ़े और लकीरें कुछ तिरछी हो गई हैं, ताकि तस्वीर मुकम्मल रहे...
राणा पाकिस्तान के पंजाब सूबे के फैसलाबाद जिले में किराने की दुकान चलाते हैं। पतली-महीन सी आवाज, एकबारगी सुनने पर दिल्लगी का मन करे कि क्या यार, नाम राणा और आवाज रनिवास से आती हुई। बहरहाल, राणा की कहानी सुनने के बाद दिल्लगी का ख्याल भी नहीं आएगा, जेहन में। राणा फरवरी 2007 में नोएडा के पास एक गांव में खेती कर गुजारा कर रहे भाई की बेटी में शिरकत करने आए। राणा और उनकी बीवी और छह बच्चे। समझौता एक्सप्रेस से वापस जा रहे थे। राणा खिड़की के किनारे बैठे खैनी रगड़ रहे थे। बेगम छुटकी को गोद में लिए कभी सो जातीं तो कभी उसके हिलने पर पुचकार फिर सुलाने लग जातीं। बाकी बच्चे नींद के कच्चेपने से बेपरवाह थे। शायद बाजी और अम्मी की डांट के बाद जागकर ऊधम मचाने की गुंजाइश बची भी नहीं थी। एकदम से राणा को बोगी में अजीब सी गंध आती लगी। झुककर हथेली सूंघी कि कहीं मिलावटी तंबाकू तो नहीं रगड़ मारी, मगर तब तक गंध फैल चुकी थी। राणा फौरन दूसरे मुसाफिरों को जगाने लगे। गाड़ी आधा घंटा पहले ही पानीपत से गुजरी थी, इसलिए चाय पीकर झपकी लेने वाले फौरन जाग गए। इतने में जोर का धमाका हुआ और गैस और भी तेजी से फैलने लगी। राणा ने चीखकर बीवी को आवाज दी, मगर दूसरे धमाके में वो आवाज भी दब गई। बीवी ने सबसे छोटी आइसा को छाती में दबाया और बाहर की तरफ लपकी। जबतक गेट पर पहुंची, उसे याद आया, या खुदा बाकी बच्चे तो सो ही रहे हैं। मोहतरमा वापस लौटतीं, उससे पहले ही गैस का एक झोंका और आया और आग तेज हो गई। पीछे से किसी ने उन्हें धक्का दिया और तब तक बोगी जलने लगी। हवा थी, धुंआ था, चीखें थी और थी बेबसी। किसी की बीवी, किसी का बच्चा, किसी की मां तो कोई बेवा। एक-एक करके 69 जिंदा जल गए। कितना अजीब लगता है न ये बोलना, लिखना जिंदा जल गए। हाथ पर जरा सी गर्म बूंद मिजाज गर्मा देती है। यहां पूरा का पूरा शरीर जला। पहले सफेद हुआ, फिर सुर्ख और फिर आगे लिखे न जाने वाले रंग में तब्दील होता।
पुलिस आई, जांच का ऐलान हुआ। घायलों को अस्पताल भेजा गया। सियासत शुरू हुई, साथ में कुछ इंसानियत भी। राणा के परिवार में बीवी और बेटी बचे थे और खुद राणा जो दूसरी बोगी से एक बुढ़िया को नीचे उतार रहे थे, जब पहला धमाका हुआ। हल्के चोटिल इस परिवार को दिल्ली लाया गया और फिर वापस पानीपत जाकर उन्होंने अपने बच्चों ( तीन बेटे-दो बेटियों की शिनाख्त की)। कैसे कलेजा मुंह में आ जाता होगा न एक बाप का, जब अपने बच्चे की लाश देखकर वो बोले, हां ये मेरी आइशा है, ये मेरा अब्दुल है....
राणा अपने बच्चों की लाश लेकर वापस पाकिस्तान चले गए। कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी क्योंकि वक्त बीतने के साथ जीना सिखा देता है, मगर जिंदगी कहानियों की माई है, अंदाजे से पहले थपकी देती, मगर खुद कभी नहीं सोती।
राणा अगले साल फिऱ पाकिस्तान से वापस आए। कुछ हिंदुस्तानियों ने समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट की बरसी पर हवन-पूजन औऱ सर्वधर्म सभानुमा प्रोग्राम किया था। यहां से किस्से में दूसरा किस्सा घुसता है।
पानीपत की कब्रिस्तान में कभी जाएंगे, तो वही मिट्टी के ढूहे, कुछ पुराने, कुछ नए पत्थर, लोबान, अगरबत्ती की गंध, एक दो आवारा कुत्ते, टोपी सीधी करते कोई बुजुर्ग, हिंदुस्तान के हर दूसरे कब्रिस्तान जैसा नजारा...मगर इस कब्रिस्तान में 32 लावारिस लाशें दफन हैं। उनके पत्थर पर किसी ने नहीं लिखा कि फलाने-फलाने यहां चैन की नींद सो रहे हैं। ये वो लाशें हैं, जो समझौता एक्सप्रेस के दौरान किसी के क्लेम न करने की वजह से यहां दफन कर दीं गईं। इनका वतन, इनका नाम, इनकी वल्दियत किसी को नहीं पता। और सच पूछिए तो ये सब हम जिंदा लोगों के लिए ही रची गई बातें हैं। मरे हुओं का कौन मसीहा....
राणा की कहानी पता चली एक मित्र के मार्फत। राणा एक बार फिर हिंदुस्तान आ रहे हैं। गोद में होने के बाद बची बेटी, अब कुछ बड़ी हो गई है और आगे से टूटे दांत से हवा बाहर आने के बाद भी ए फॉर एप्पल साफ बोल लेती है। राणा इस बार आ रहे हैं सरोजनी नगर ब्लास्ट की बरसी में शिरकत के लिए। उनका कहना है कि आतंक इंसान की जात और मजहब पूछकर उसे अपना शिकार नहीं बनाता, इसलिए इसके खिलाफ लडा़ई भी साझा होनी चाहिए। चूंकि राणा की कहानी, उनके जज्बे की खबर लिखनी थी, इसलिए राणा के दोस्तों से उनकी तस्वीर की डिमांड कर दी। दोस्त ने जो तस्वीर दी, वो एक नहीं दो थीं। एक तस्वीर में राणा अपने चार बच्चों के साथ बगीचे में बैठे हैं। एकदम फूल से बच्चे. कोई टीशर्ट के ऊपर टीशर्ट पहने, तो किसी के जूते और पैंट के बीच से मोजा झांकता। दूसरी तस्वीर में सबसे बड़ी बेटी सबसे छोटी बहन को हाथ में थामे खड़ी है। दोनों तस्वीरों को स्कैन कर लिया गया, ताकि सॉफ्ट कॉपी का इस्तेमाल किया जा सके। फ्रेम की हुई दोनों तस्वीरें मेरी डेस्क पर रखी थीं, कंप्यूटर के ठीक बगल में। काम करते-करते नजर पड़ी और चौंक गया। अजीब सा लगा ये सोचकर कि मेरी मेज पर चंद मरे हुए लोगों की तस्वीरें रखी हैं, मुस्कराती और मेरी तरफ देखती। आंखों में कुछ कांपने सा लगा। लगा कि बच्चे बस अभी कुछ बोल ही देंगे।
कानों में इन बच्चों की मां की आवाज गूंज रही थी। बड़ी हुलस के साथ वो बोली थीं सलाम भाईजान। रामकसम, इतनी मुहब्बत से आजतक किसी ने सलाम नहीं बोला था। फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो अजीब लगना कुछ कम हुआ। जिंदगी में पहली बार पाकिस्तान कॉल लगाई थी। किसी ने मजाक में कहा भी देखना कहीं फोन टैप न हो रहा हो।
फटाक..................बोतल जब पहाड़ से टकराती है, तो तीन तरह की आवाजें आती हैं। आवाज इससे तय होगी कि बोतल खाली थी, भरी या आधीभरी। खाली बोतल की झन्न में न कर्कशता कम होती है, मगर कोफ्त कि क्यों जंगल गंदा कर रहे हो। पूरी भरी बोतल सिर्फ धोखे से फूटती है और उस गुदगुदाते पल का एहसास तब पुख्ता होता है, जब बोतल में भरे सामान के नुकसान की याद कम हो जाती है। तीसरी आवाज होती है किसी जावेद की, किसी रणंजय की, जो बहस के तेज होने के साथ बोतलें उछलने पर आती है। चौंकिए मत, उनके बीच झगड़ा नहीं हुआ था। मुद्दा अभी भी कश्मीर ही था, मगर आवाजें कुछ तेज हो गई थीं और इसी दौरान धोखे से, 24 कैरट धोखे से एक बोतल नीचे गिर कर टूट गई थी। जावेद ने आज पहली बार शराब चखी थी। उसकी जबान सुर्ख हो चुकी थी और वो जोर से पहाड़ी पर चढ़कर चीखा कि कमजोरों की आवाज नहीं सुनी जाती, इसीलिए तो सारा फसाद होता है। अरे आवाज तो सुनलो, करना किसको क्या है। आवाज बहुत तेज थी, सब चुप हो गए। रात का सन्नाटा इस शोर से आहत था। चुप्पी अंधेरे में घुल ही रही थी कि जावेद के गिरने की आवाज आई। भाई-भाई तीन लोग उसकी तरफ लपके। मना किया था न, मत पिला इसे नहीं झेल पाएगा, फैल जाएगा, उधर जावेद मियां मुस्कराते हुए बोले क्यों भाई अपना तो जय जिहाद हो गया न.......
क्या बकवास है, जय जिहाद। एक आवाज बोतल टूटने की, एक आवाज उस औरत के बोगी से नीचे गिरने की और फिर एक आवाज एडिटर की, स्टोरी पूरी हो गई क्या। मेरी मेज पर अभी भी मरे हुए बच्चे मुस्करा रहे थे। वो सच में कुछ कहना चाह रहे थे...गीली आंखों से, लरजती-तुतलाती आवाज से मगर हम सुन नहीं पाए क्योंकि कानों में जय जिहाद का जुमला अटका था।


और फिर ः -अब फिर कभी मरे हुए बच्चों की तस्वीरें नहीं लगाउंगा। कम्बख्तों को देखकर भूल जाता हूं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का फर्क, हिंदू और मुसलमान का फर्क, सिर्फ दर्द का, प्यार का और पाकीजगी का मजहब याद रहता है।
-फिर कभी मरे हुए बच्चों की मुस्कान नहीं देखूंगा। इन्हें देखकर दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, इस्लामाबाद, लंदन, न्यू यॉर्क और दुनिया के तमाम कोनों में हुए बम धमाकों में मारे गए बच्चों की मुस्कान दिखती है। मगर मुस्कान के दुधिया रंग के ऊपर खून के कुछ छींटे भी होते हैं।
- अब फिर कभी मैं पाकिस्तान फोन नहीं करूंगा। नेताओं पर गुस्सा आने लगता है यार, आखिर क्यों सरहदें खिंचीं और खिंची भी तो उन्हें बना क्यों रहने दिया गया
- और सबसे आखिर में उन भाई बंधुओं को राम-सलाम जो इस पोस्ट को पढ़कर मुझे गाली सुनाएंगे, बुरा-भला कहेंगे। कोई पाकिस्तान को कोसेगा, कोई इस्लाम को, तो कोई हिंदुओं को...मगर एक गुजारिश है कुछ भी लिखने से पहले याद करना, आखिरी बार किसी मरे हुए बच्चे की मुस्कराती तस्वीर देखकर आंख गीली हुई थी क्या......

Wednesday, August 06, 2008

बारिश ने खत भेजा है

आखिरी बार बारिश में कब भीगे थे तुम? क्या हुआ बारिश सुनकर सिर्फ कीचड़, रेंगता ट्रैफिक और घर जाते या ऑफिस आते हुए भीगने का डर ही सामने आता है। बचपन की उन यादों को कहां दफन कर दिया, जब कई बार पुरानी तो कुछ एक बार नई और कोरी कॉपी से भी पन्ना फाडक़र नाव बनाते थे। भैया से इसरार करते थे कि मेरी नाव सीधी कर दो। मां या चाची डांटती रहती थी कि पानी गंदा है, फुडिय़ा हो जाएगी, मगर मन कहां माने। आखिर अपनी बनाई किसी चीज को मंझदार में आगे बढ़ते देखने का सुख कौन खोना चाहता था। और फिर रात में सोते वक्त दीवारों से कैसी गीली सी गंध आती थी। एक नन्हा सा डर भी रहता था कि कहीं सांप चारपाई के पाए चढक़र मेरे ऊपर आ गया तो। इस डर के रास्ते कुछ देर के लिए ही सही भोले शिव की याद और एक-आध फुटकर सी जयकार हो जाती थी। अब तो जरा सा खटका भी नींद में खलल पैदा करता है और तब रात भर झींगुरों की चीख और मेंढकों की टर्र-टर्र बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह लगती थी। सुबह उठते थे तो लालटेन या बल्ब के पास पतंगों का ढेर देखकर मन घिनाता नहीं था। सुबह जब चौंपयारीबखरी का दरवाजा खोलते तो यकीन होता कि रात भर में ही दुनिया बदल गई होगी। हर पत्ती ज्यादा हरी और नहाई धोई लगती। जानवरों के बदन पर गीली सी रेखा बनी होती, गाय की आंखों में कीचड़ देख घिन नहीं आती। मगर ये सब हम बहुत पीछे छोड़ आए। अब मां से जिद कस्बे जैसा पिछड़ा भाव लगने लगा है। पालक की पकौड़ी के लिए चढ़ती कड़ाही की जगह बहुत शौक और मन हुआ तो किनारे खड़े खोमचे वाले की डलिया ने ले ली है। उस पर भी भाई लोगों का तुर्रा, बारिश में खा रहे हो बीमार पड़ जाओगे। बारिश होते ही रेन कोट खरीदते हैं। सच सच बताना कभी ये चिंता की है कि बाहर के बगीचे में पलने वाले बिल्ली के बच्चे पानी से कैसे बचेंगे। अब उनके लिए बोरा छिपाकर रखने का मन नहीं करता। नाव बनाना याद है या पैसा और करियर और जिंदगी और तमाम और बनाने के फेर में वो पाठ भी भूल गए.....
आज बहुत दिनों बाद बारिश महसूस की। न सिर्फ बदन पर बल्कि मन पर भी, वो जहां कहीं होता हो ।बारिश के साथ तेज हवा थी, सो पूरी तरह भीग कर मजा लेने की जरूरत नहीं पड़ी। तेज छींटे सिर से लेकर पांव तक बचपन की याद दिला रहे थे। मन किया बस यूं ही घंटों तर होता रहूं। जैसे नए बने घर की दीवारें तर की जाती हैं। जैसे बारिश में गाय को गुड़ खिलाया जाता है ताकि ठंड भी न लगे और दूध भी बढ़े....जैसे मां खूब रगडक़र सिर पोंछ रही हो और हमें फिर से बाहर भागने की जिद ने जकड़ लिया हो।एक बार ही सही बारिश में आंख बंदकर, सब भूल कर खड़े हो जाओ। कीचड़ की चिंता, कपड़े और जूते खराब होने की चिंता को चिता में डाल दो और हर रोएं में बारिश की बूंदों को कुछ देर के लिए ही सही पनाह दे दो...जिंदगी आबाद लगने लगेगी।

Friday, July 11, 2008

पुरानी दिल्ली संग पहली डेटिंग...

दिन हो गए ब्लॉग पर कुछ लिखे। पिछले दिनोंं जमकर ऑस्कर जीतने वाली मूवी देखीं। मसनल गर्ल इंटरप्टेड, ब्लड डायमंड , फिलाडेल्फिया और भी बहुत सारी। एक बात को साफ है यारों। हॉलिवुड इस बात का खास तौर पर ध्यान रखता है कि फिल्म जिस मकसद से बनाई जा रही है वो पूरा हो। स्टोरी लाइन बेहत चुस्त होती है। कैरेक्टर मेंं इनवॉल्व होने के लिए पूरा वक्त मिलता है। पेस और ठहराव को सेल्युलाइड पर दिखाने मेंं उनकी कोई सानी नहीं। हमारे यहां निर्देशक जब कभी ठहराव का खूबसूरत इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं सीन ज्यादातर लाउड हो जाते हैं। बहरहाल मुझे कोई फिल्म क्रिटीक का धंधा पानी तो शुरू करना नहींं जो आप लोगोंं को ज्ञान देते फिरूं। रकीब को तो वैसे भी इस बात की बहुत शिकायत रहती है कि जब मौका मिले शुरू हो जाता है लडक़ा गोला देने में। ये हमारे रकीब का अपना अंदाज है हमेंं कंट्रोल मेंं रखने का। वैसे भी फुल स्टॉप न हो तो नया सेंटेंस शुरू नहीा हो सकता। कल एक और खास अनुभव हुआ। पहली बार बाइक पर सवार होकर पुरानी दिल्ली की गलियोंं मेंं भटक रहा था। एक स्टोरी के सिलसिले मेंं तुर्कमान गेट इलाके की तरफ जाना हुआ था। जिन जनाब ने पता बताया था उन्होंने हिदायत भी दी थी कि बेहतर होगा कि आप कुछ फासले पर ही गाड़ी खड़ी कर रिक् शे से जाएं। मगर हमेंं तो ऐसा लगता था कि भाई कस्बे से होकर आएं हैं। ऊबड़ खाबड़ सडक़ोंं और बाजार की तंग गलियों मेंं भला हमारी राइडिंग पर कोई कैसे उंगली उठा सकता है। सो पिल पड़े। साथ मेंं एक दोस्त भी थी। कंधे पर कभी कभी उसकी मजबूत होती पकड़ बता रही थी कि उसे न तो मेरी बॉर्न बाइकर वाली डीलिंग पर ऐतबार था और न ही दिल्ली मेंं इतनी तंग गलियों की उम्मीद। सोने पर सुहागा ये कि गाड़ी का हॉर्न भी खराब था। अब जरा इत्मिनान हो तो कुछ पल हॉर्न की भी कहानी सुन लीजिए। हमने ठीक कराया था हॉर्न पिछले दिनों। रकीब ने खास तौर पर खटारा को बेहतर खटारा बनवाने के लिए रुपये उधार दिए थे। लेकिन जनाब हॉर्न तो पहले भी ठीक था। मगर हमारे मिस्त्री साहब जिनका नाम है मियां मुशर्रफ बोले कि नहींं साहब हॉर्न तो ठीक नहींं था। हमने नया लगा दिया था। अब क्या कहते उनसे कि हमें जरदारी समझ रखा है क्या जो तुम्हारे झांसे मेंं आ जाएंगेष मगर रकीब इंतजार कर रहे थे और अपन का बहस का कोई मूड भी नहींं था तो सोचा चलो जब कलाई पुत ही रही है तो थोड़ी कम या ज्यादा क्या फर्क पड़ता है। सो 90 रुपये हॉर्न की राह पर कुर्बान हो गए।मगर पहली बरसात के बाद ही कमबख्त हॉर्न दगा दे गया। ससुरा मायके मेंं जाकर बैठ गया है। जब बारिश होती है उसके अगले रोज बजता है। कहींं से पानी की छुअन पाकर दिमाग की गर्मी ठीक हो जाती होगी शायद। मगर इससे पहले की आप रकीब को रुआब से बताएँ कि अब हॉर्न भई ठीक हो गया है फिर से आराम फरमाने लगता है साला। हां तो साहब हम बता रहे थे कि पुरानी दिल्ली की गलियोंं मेंं भटक रहे थे। पहले से दूसरे और दूसरे से पहले गियर तक का सफर तय करते। और आखिरकार हम पहुंच ही गए चांदनी महल इलाका। कूड़े के ढेर से बजबजाता ये इलाका कभी बहादुर शाह जफर द्वारा अपने कव्वाल उस्ताद को दिया गया था। अब जब पहुंचे तो किनारे एक बकरी और बकरे में संभोग करवाया जा रहा था। जगह की किल्लत कहिए या कुछ और कि अब जानवरोंं को गर्भ धारण करवाने के लिए भी सडक़ का ही इस्तेमाल होता है। आसपास हल्ला मचाते बच्चे थे। इनमें ही ढूंढने थे मुझे आने वाले कल के साबरी बंधु जिनके गले से निकले सुर उर्स के दौरान पीर से मुलाकात का जरिया बनते हैं।हम जिनसे मिलने के लिए पहुंथे थे वो छज्जे पर टंगे हमारा ही इंतजार करते थे। कानपुर के अहातों मेंं बने तंग मकानोंं का याद दिलाती संकरी सीढिय़ां। बचपन मेंं जब भी ऐसी सीढिय़ां से पाला पड़ता था बस एक ही ख्याल ऊपर पहुंचने या नीचे उतरने तक हमसाया रहता था कि अगर पैर फिसला तो सिर मेंं कितनी चोट आएगी।अंदर हमारे मेजबान थे जिनके वालिदैन को कव्वाली सम्राट का खिताब बख्शा गया था। इंटरव्यू के दौरान कव्वाली के बारे में तमाम मालूमात हासिल किए। मेजबान का जोर था कि उनके और उनके बच्चोंं का जमकर जिक्र किया जाए। मीडिया खबरोंं की खोज में रहती है, लेकिन खबर बनाने वाले ही जब खबर बनने का लालच दिखाने लगें तो तकलीफ होती है देखकर। आप कह सकते हैं कि उनमें ये लालच भरने के लिए भी हम ही जिम्मेदार हैं। इस पर चर्चा फिर कभी।....बहरहाल आखिर मेंं मेजबान ने हमें कुछ खूबसूरत नज्में सुनाईं। इनमेंं एक थी अमीर खुसरो साहब की छाप तिलक सब दीन्ही तोहसे नैना मिलाइके। कुछ याद आया क्या। शाद अली की साथिया में इससे मिलता जुलता गाना था झूठ कपट छल कीन्हीं....आपसे साथ किसी के नैनों ने कपट किया है क्या...इस ठगी का शिकार होने मेंं बहुत मजा है बंधु...मगर हौसला चाहिए लुटने का.......

Monday, May 19, 2008

मां से झगड़ा २

पिछले दिनों घर में शादी थी। बुआ जी की बेटी की। नेहा नाम है दीदी का। उम्र में महज ६ महीने का फासला है, इस वजह से अनुराग कुछ ज्यादा था उससे। इसकी एक वजह शायद कोई सगी बहन न होना भी रहा होगा। बहरहाल मैं अकसर उससे फोन पर पूछता तुझे क्या चाहिए। आखिरी मैं उसने झिझकते हुए कहा कि लाल गोटे वाली साड़ी। अच्छा लगा । सक्षमता का थोड़ा बहुत ही पता तब चलता है, जब आप अपनों की ख्वाहिश पूरी कर सकें। खैर लंबे अर्से बाद घर जा रहा था सो मां के लिए भी साड़ी खरीदनी ही थी। जब खरीदने पहुंचे तो जो साड़ी पसंद आई वो बजट से काफी ज्यादा थी। रकीब ने कहा- कोई बात नहीं जब पसंद आई है तो यही ले लो। अब तुम कमाते हो मां को अच्छी से अच्छी साड़ी पहनाओ। रकीब की बात जम गई। साड़ी लेकर घर पहुंचे। मां को पसंद आई तो अच्छा लगा। फिर उसने पूछा कितने की है तो झूठ नहीं बोल पाया। मां के सामने सब कुछ सच-सच बताने का मन क्यों करता है। सिगरेट पीने से लेकर हर चीज तक। खैर दाम सुनकर मां का माथा ठनका। शुरू हो गई कि ज्यादा पैसे की गर्मी चढ़ी है। खैर मामला शांत हुआ। इसमें साड़ी पर हाथ से हुए काम की तारीफ ने भी काफी रोल अदा किया। लेकिन उसके बाद से जब भी घर फोन करता हूं, अंत में आशीर्वाद के साथ एक सूत्र लिपटा हुआ आता है। बेटा पैसा बचाओ, इतनी महंगी साड़ी खरीदी, कसक के रह गई। अब मां को कौन समझाए कि उनका बार-बार इस तरह से टोकना मुझे भी कसक कर रह जाता है। माई की आंखों में लाल के कमाने की चमक देखने के लिए इतने जतन किए थे। मगर मां मन के भावों को छिपाना बखूबी जानती है। ... खैर ये थी मां से हुए ताजा झगड़े की राम कहानी... अब कुछ बात यारों की प्रतिक्रिया पर। शंभू जी का स्नेह में भीगा पोस्ट आया। हमारे शंभू जी बड़ी तपस्या करते हुए दिल्ली आए हैं। कई बार उनका मन करता है कि बिहार के अपने गांव दुआर वापस लौट जाएं लेकिन अभी थमे हुए हैं। शहर का लालच बहुत बुरा है। यहां की हर चीज लालच भरती है। या कम से कम हर चीज के लिए लालसा तो जगा ही देती है। शहर और सपना किसी अजनबी भाषा में साथ-साथ लिख दिए गए दो पदबंध से लगते हैं। उसी शहर में हम भी अपनी जिंदगी की राह तलाशने आए हैं।

बहुत दिनों बाद हुई सुबह

सुबह सवेरे गुड मॉर्निंग कहना अच्छी बात है। आज कई दिनों बाद मैंने भी सुबह देखी। इन दिनों जेएनयू की सुबह बहुत खूबसूरत होती है। यार दावा कर सकते हैं कि कब नहीं होती। रात गए हवा ने जमकर नहाया सो सड़कों पर पानी फैला पड़ा था। कहीं कहीं पानी के चहबच्चे जमा हो रखे थे। इन सबसे खुश होकर अमलताश के पीले फूल सड़क पर बिखरे पड़े थे। लगा कि कोई अल्हड़ नवयौवना खुद की खूबसूरती से बेपरवार हो बाहर निकल पड़ी है। शर्ट में बाइक चलाने के दौरान इसी हवा का कुछ हिस्सा अंदर घुस रहा था। गुदगुदाता सा अहसास जिसने सुबह सवेरे नींद पूरी न होने पर भी उठने की वजह से गुजलाए मुंह को ताजगी के अहसास से भर दिया। सुबह वाकई खूबसूरत होती है। सोच रहा हूं कि अब उससे मुलाकात में ज्यादा फासला न रखा करूं। खैर हाल ए नसीम यहीं खत्म होता है...एक शेर याद आ रहा है.... रात होगी घनी काली गम की बदरी भी छाएगी, सुबह का इंतजार करना सुबह जरूर आएगी...

Saturday, May 17, 2008

जिन्हें जाये तिनहीं लजाए...मां से झगड़ा १

मां से मेरी कभी पटरी नहीं खाई । लेकिन मैं हर नालायक की तरह उनसे बहुत प्यार करता हू। मां से प्यार करने में एक सहूलियत भी रहती है । जब मन किया उसकी सीने पर सिर रखकर बोल दिया पुच्ची करो न। कभी झुंझलाती तो कभी दुलारती मां कहती हटो पूरा काम पड़ा है घर का । इतने बड़े हो गए लेकिन लड़कपना नहीं गया। अब मैं मां को क्या बताऊं कि उनके साथ कभी जाएगा भी नहीं। खैर इन सबके बावजूद मेरा मां से झगड़ा है। जब उनसे जाति से लेकर छींकने जैसे अंधविश्वास सहित किसी मुद्दे पर बहस होती थी तो आखिरी में उनका ब्रह्मास्त्र चलता था । साला कल का लौंडा चला है मुझे पढ़ाने । अरे चौंकिए मत मां गाली नहीं देती लेकिन हमारे यूपी में साले अब गाली कहां रह गई है। खैर इस पर भी मैं जब नहीं मानता और बहस को हवा पानी देता रहता तो आखिरी में मां कहती । है तेरी शनीचर की जिन्हें जाए तिनहीं लजाए। माई तेरा बेटा तुझे लजाने के लिए परदेस में नहीं बसा है। इंतजार तो बस उस दिन का है जब अपनी पटकथा झूठी लड़कियां पूरी करूंगा। इसमें आज के जमाने की बेटियों की कहानी है जो अपनी मां से बहुत प्यार करती हैं लेकिन साथ ही एक डर के साथ भी जीती हैं कि कहीं वे भी अपनी मां की तरह न बन जाएं। कहीं उनके भी तमाम औजार किंतु परंतु और मर्यादा की आड़ में भोथरे न कर दिए जाएं। झूठी लड़किय बड़े शहर में आई हैं अपना वजूद साबित करे का सपना लेकर। उन्हें बॉयफ्रेंड के साथ घूमने भी जाना है मगर ये बात मां से छिपाने के लिए यह भी कहना है कि मां रेशमा की बर्थ डे पार्टी में जा रही हूं। उन्हें किस करने में झिझक नहीं लेकिन शादी के लिए मां बाप की रजामंदी भी चाहिए। और हां खबरदार जो किसी ने उन पर महज इसलिए तरस दिखाने या सटने की कोशिश की कि वे लड़कियां हैं....बीते दिनों एक नई दोस्त बनी। डॉक्युमेंट्री की दुनिया से बावस्ता है वो। उसे बड़ी कसक है कि पापा के जाने के बाद हम सब तो अपने करियर की राह नापने में लग गए मां अपने कोने में टीवी के किरदारों से यारी करने के लिए मजबूर हो गई। सो मेरी दोस्त ने फैसला किया कि छुट्टी पर जाने के बजाय मां के साथ वक्त बिताया जाएष मगर कुछ ही दिनों में ये संकल्प सजा बनता दिखने लगा। मां अपने तमाम डर बेटी पर लादने सी लगी। ये मत किया कर जमाना खराब है। ऐसे सब से मत घुलामिलाकर लोग गलत मतलब निकालते हैं आदि इत्यादि। अब वो कैसे बताए कि इसी खराब जमाने में आपके बाद भी और फिलहाल आपके साथ भी मुझे जीना है। अपनी मंजिल तलाशनी है। मां बेटी के बीच कब वक्त ने आकर दीवार चुन दी पता भी नहीं चला। बेटी स्टोर रूम में रखी उस पेंटिंग को बाहर निकालकर फ्रेम करवाना चाहती है जो मां ने अपनी शादी के ठीक बाद या सपाट लहजे में कहें तो जवानी के दिनों में बनाई थी। उस पेंटिंग में नहाने के बाद बाल सुखाती एक लड़की है। बदन पर महज एक तौलिया है वो भी बालों से लिपट लिपट हमेशा के लिए घरौंदा बनाने की इजाजत मांगते पानी को सहेजने के लिए। औरत के भरे पूरे खूबसूरत स्तन साफ नजर आ रहे हैं। उनमें मादकता है , अपने होने की एंठन है और है थोड़ा सा शरारती नमकीनपन। सत्तर के दशक में मां ने जब ये पेंटिंग बनाई होगी तब मिडल क्लास की क्या मानसिकता रही होगी बताने की जरूरत नहीं। मां ने जैसे अपने औरतपन को सहेजने के लिए ही वो तस्वीर बनाई थी। उसकी एक एक लकीर मानो चुनौती दे रही थी कि ये मैं हूं। मैं एक भरी पूरी पूरी की पूरी अपने होने पर कतई शर्मिंदा न होती औरत। क्या तुममें हिम्मत है इसे अपनी आंखों के सामने बनाए रखने की। पेंटिंग में निप्पल्स तक की बीरीकियों पर ध्यान दिया गया था। फिर वक्त की धूल तले उस पेंटिंग के रंग हल्के प़ड़ने लगे। कभी पापा से दो दिन झगड़कर उस पेंटिंग को ड्राइंग रूम में टांगने की जिद करती मां ने बड़ी होती दीदी और उनकी आने वाली सहेलियों का हवाला देकर पेंटिंग को पहले अपने कमरे में टांग लिया औऱ फिर स्टोर रूम तर पहुंचा दिया। क्या मां को दीदी में अपनी आग नजर आने लगी थी। क्या मां उसकी तपिश से जलने का डर पाल बैठी थी।...कल बताऊंगा आगे का किस्सा...

Friday, May 16, 2008

किस्त नंबर वन

सच क्या है सबसे ज्यादा रिझाने वाला किस्सा और किस्सा सबसे बड़ा सच। हम नहीं भूले हैं बचपन की कहानियां जब बीरबल हमेशा अपनी हाजिरजवाबी से न सिर्फ अकबर बलि्क हमें भी अपना फैन बना लेता था। लेकिन नींद बीत जाने के बाद जब जागते थे तो आस पास की दुनिया में किस्से के सच तलाशते आंख दर्द करने लगती थीं।